'यहाँ पोस्टर लगाना मना है' दीवारों की रंगत उड़ाने की हिमाकत अगर कोई करता था तो वो थे पोस्टर,चुनावी अखाड़े में जहाँ लाउडस्पीकर,टेम्पो,रिक्शे पर रख कर गाँव-मोहल्ले की सैर करते थे वहीँ बैठे बिठाए घर तक सन्देश चिपकाने का हुनर पोस्टरों से बेहतर शायद ही कोई और कर पाता था,खूबसूरती से पेंट हुई दीवारों और दरवाज़ों को रात में सही सलामत छोड़ कर चैन की नींद सोने वाले लोगों की सुबह तकलीफदेह होती थी जब उनकी निगाह नेता जी की मुस्कुराती और हाथ जोड़े हुए तस्वीर और उसके निचे लिखे वायदे पर पड़ती थी,इन वादों का असर क्या होता ये तो कहना मुश्किल है पर उससे पहले घर के तमाम सदस्य हाथों में बाल्टी ,मग और निरमा पाउडर लिए हुए पोस्टर साफ़ करने में जुट जाते थे,मुश्किल तो तब होती थी जब रात के स्याह अँधेरे में नेता जी के कारिंदे लकड़ी की सीढियों के सहारे आसानी से नही पहुच पाने वाली जगह तक अपनी पहुच बना लिया करते थे,इन सीढियों के सहारे कुछ तो पोस्टर बचे रह पाते थे पर मकान जिनका होता था वो भीतर ही भीतर उम्मीदवार को कोसते और पोस्टर हटाने की असफल कोशिश के दौरान चार पांच गालियों की पोटली ज़रूर बाँध आते थे उस जगह जहाँ न तो नेता जी पहुच पाते न ही पोस्टर चिपकाने वाले उनके कारिंदे.!
पोस्टर लगते तो लगता था चुनावी दंगल शुरू हो गया है,लाल,हरे और केसरिया रंग के इन पोस्टरों की खासियत होती थी,नेताओं को खुश करने के लिए छुट भईया नेता हजार-दो हजार की संख्या में पोस्टर छपवा कर गली-मोहल्ले में चिपकवा देता था,रात में ही चावल की लेई बनती,उसको मिटटी या सिल्वर के बर्तन में रख कर सायकिल से आधी रात में कुछ लोग निकलते,ठण्ड के मौसम में मुह पर मफलर की चार परत लपेटे इन लोगों को देख कुत्ते शोर मचाते तो सांस ऊपर नीचे होती,गश्त पर निकले हुए हवालदार साहेब की भद्दी गलियां और हवालदार के जाने के बाद पोस्टर चिपकाने वालों की गालियाँ एक आपसी संवाद स्थापित करती जिसका असर पोस्टर चिपकाने के वक़्त हँसने में काम आता !
इस बार पोस्टर खोजने से मिल नही रहे हैं,ऐसी बात नही है की आर्थिक मंदी ने नेताओं की कमर तोड़ दी या फिर महंगाई ने पोस्टर के दाम में उछाल लगा दी है,असल बात है चुनाव आयोग की सख्ती जिसके कारण नेता किसी भी किस्म का जोखिम नही उठाना चाह रहे हैं,पोस्टर वो भी बिना इजाजत के लगाने से किसी भी वक़्त खटिया खड़ी हो सकती है ऐसा सोच कर कोई भी सांप के बिल में हाथ नही डालना चाहता ,ऐसे में दीवारों पर लगे पेंट चुनाव आयोग को दुआ दे रहे हैं पर साथ ही साथ पोस्टर चिपकाने और उनमे लिखे लोक-लुभावन चुनावी वादे-कसमों की की पंक्तियाँ अब इतिहास का अध्याय बनने की और निकल पड़े हैं,आइये इस बदलाव को स्वीकार्य करे पर इस स्वर्णिम पन्ने को तरोताज़ा रखने के साथ गाहे बगाहे चुनावी माहौल को गर्म करने के लिए दिए गये इसके योगदान को याद भी करते रहे.!
पोस्टर अमर रहे ...

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