Friday, 10 February 2012

राहुल गांधी का सपना,यूपी हो अपना

कहा जाता है की उत्तर प्रदेश से हो कर संसद की सीड़ियाँ तय होती हैं,इस बात का ख्याल राहुल गांधी को तब नही था जब उन्होंने उत्तर प्रदेश के उन कामगार लोगों की खिल्ली फूलपुर के शुरूआती चुनावी रैली में उड़ाई थी जो यूपी से दुसरे राज्यों में कारोबार करने के लिए जाते हैं,पर मामला तूल पकड़ते ही पूरी कांग्रेस पार्टी बैकफुट पर आ गयी, लगे हाथ फूलपुर में सपा के कार्यकर्ता की केन्द्रीय मंत्रियों द्वारा की गयी पिटाई ने भी कांग्रेस को परेशानी में डाल दिया था,इन सब से उभरते हुए राहुल गांधी ने यूपी फतह की कमान खुद के कन्धों पर ले ली,गांधी परिवार की इस नई पीढ़ी के खेवनहार  ने यूपी के दूर-दराज़ इलाकों के तूफानी दौरे कर डाले,इनमे जुटने वाली भीड़ और राहुल जिंदाबाद के लगने वाले नारों ने कांग्रेस को यूपी विजय का सपना दिखा दिया !
एक ओर जहाँ उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के उद्घाटन मौके पर छात्र नेता की पिटाई हुई वहीँ दूसरी ओर फैजाबाद के मिल्कीपुर में राहुल गांधी नवजवानों के सहारे मृतप्राय कांग्रेस में जान फूंकने की बात करने लगे,राहुल में आया यह बदलाव एक परिपक्व राजनेता के प्रारम्भिक विजय का सूचक लगने लगा,राजनैतिक पंडितों की माने तो अब अमूल बेबी हाथी के चारे पर सवाल और सायकिल के समाजवाद पर निर्भीकता से वार करने लगा है,राहुल की सभा में जहाँ एक ओर हजारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने आ रहे हैं वही कुछ जगह से उनके विरोध की खबर भी मिल रही है,फिर भी यूपी की जनता को सीखने और समझने आये राहुल को  फैजाबाद में सुरक्षा घेरा तोड़ लोगों से हाथ मिलाने से कोई रोक नही पाया.!
पिछले बाईस सालों से वनवास झेल रही कांग्रेस के लिए यूपी चुनाव में जीत हासिल करना एक सपने जैसा लग रहा है,जहाँ उत्तर प्रदेश में बाकी अन्य पार्टियाँ जाती-वाद के मुद्दे को अन्दुरुनी तरीके से स्वीकार्य कर अपना गुणा गणित फिट करने में लगी हैं वहीँ कांग्रेस मजबूत प्रत्यासियों के सूखे से आज भी पीड़ित है,दिग्ग्विजय का जादू पूर्वांचल में अपनी पकड़ नही बना पाया,इसके लिए खुद दिग्गी राजा कितने कसूरवार है और कितनी कांग्रेस की राजनीति यह तो चुनाव बाद ही पता चल पायेगा फिलहाल उलेमा कौंसिल और पीस पार्टी ने कथित आतंकवाद एवं अल्पसंखयक युवाओं को बेवजह जेल में डालने के मुद्दे को लपकने में कामयाबी हासिल कर दिग्ग्विजय के सपने को ठेस पहुचने का काम किया है,वहीँ अन्य पिछड़ी जातियों के २७ % आरक्षण में से ४.५% आरक्षण अल्पसंख्यकों को देने के मामले में भी कांग्रेस को मुह की खानी पड़ी,भारतीय जनता पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी कांग्रेस के इस फैसले के मुखर विरोध में आ गये हैं वही दूसरी तरफ सलमान खुर्शीद के ९% के वायदे ने पिछड़ों के भीतर एक भय बनाने का काम किया है,इस मुद्दे पर भी अन्य पार्टियों ने कांग्रेस को घेरने का प्रयास किया किन्तु सफलता का प्रतिशत कितना हाथ आया ये  कहना मुश्किल होगा,पर इस संवेदनशील मुद्दे को भुनाने में बीजेपी ही दिलेरी दिखा रही है,बाबूलाल कुशवाहा प्रकरण से पिछड़े से  अगड़ा बनने के चक्कर में अपनी फजीहत पार्टी के भीतर करवाने के बाद आरक्षण एवं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आगे आ कर चिल्लाने से फिलहाल तो तौबा कर चुकी बीजेपी के लिए कांग्रेस को रोकना यूपी में मुश्किल हो रहा है !
अन्ना द्वारा दिया गया भ्रष्टाचार का मुद्दा यूपी में आते आते दम तोड़ चूका फिर भी कांग्रेस को नैतिक प्लेटफार्म पर घेरने के लिए वर्तमान में समाजवादी पार्टी से ज्यादा हिम्मत किसी अन्य में नही ,उसकी वजह बीजेपी द्वारा केन्द्र में कांग्रेस को घेरने के लिए की गयी बचकानी तैयारियां  और बी एस पी के ऊपर लगे एन.आर. एच. एम. घोटाले का आरोप ,अब बचा एक मात्र बड़ा विकल्प समाजवादी पार्टी के रूप में ,सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव अपनी हर एक रैली में कांग्रेस,राहुल पर खुल कर बरस रहे हैं,कांग्रेस के खिलाफ तो बोल सभी रहे हैं पर जनता के बीच में जिस आत्मविश्वास से केंद्र में कांग्रेस को बाहर से  समर्थन दे रही सपा के प्रदेश अध्यक्ष बुराईयाँ,बारीकियों के साथ गिना रहे हैं वैसे में जनता की हमदर्दी बटोरने में के साथ ही साथ सत्ता परिवर्तन कर चाभी सपा के हाथ में सौंपने की विनती  भी लगे हाथ कर लेते हैं !
प्रदेश में बाईस सालों की दुहाई दे कर कांग्रेस प्रदेश की जनता को विकास का झुनझुना थमाने की कोशिश में है,लोगों से बदलाव के नाम पर वोट कांग्रेस को देने की अपील रायबरेली में प्रियंका गांधी ने भी पर जब वही २४ घंटे में ७ घंटे बिजली आ रही है तो ऐसे में लाजिमी है की सवाल कांग्रेस पर उठेगा,क्योकि रायबरेली और अमेठी कांग्रेस का रजवाड़ा रहा है,जब पैतृक सीट पर ही विकास की रौशनी नही दिख रही हो तो बाकी प्रदेश का हाल कैसा होगा ये तो मतदाता जाने,लेकिन यूपी को आसान समझने वाले राहुल और कांग्रेसी ब्रिगेड के लिए ये लोहे  के चने चबाने जैसा ही होगा,यदि कांग्रेस का सपना सच होता है तो राहुल की राजनीति का भविष्य ज़रूर एक नये रंग और लिबास में होगा इस बात से इनकार चाहे प्रियंका करे या फिर खुद कांग्रेसी,क्योकि चुनावी नतीजे से पहले किसी भी नतीजे के बाद की तस्वीर न तो राहुल साफ़ करना चाहते हैं और न ही कांग्रेस पार्टी.!

Monday, 6 February 2012

इस बार पोस्टर नही छपे..

'यहाँ पोस्टर लगाना मना है' दीवारों की रंगत उड़ाने की हिमाकत अगर कोई करता था तो वो थे पोस्टर,चुनावी अखाड़े में जहाँ लाउडस्पीकर,टेम्पो,रिक्शे पर रख कर गाँव-मोहल्ले की सैर करते थे वहीँ बैठे बिठाए घर तक सन्देश चिपकाने का हुनर पोस्टरों से बेहतर शायद ही कोई और कर पाता था,खूबसूरती से पेंट हुई दीवारों और दरवाज़ों को रात में सही सलामत छोड़ कर चैन की नींद सोने वाले लोगों की सुबह तकलीफदेह होती थी जब उनकी निगाह नेता जी की मुस्कुराती और हाथ जोड़े हुए तस्वीर और उसके निचे लिखे वायदे पर पड़ती थी,इन वादों का असर क्या होता ये तो कहना मुश्किल है पर उससे पहले घर के तमाम सदस्य हाथों में बाल्टी ,मग और निरमा पाउडर लिए हुए पोस्टर साफ़ करने में जुट जाते थे,मुश्किल तो तब होती थी जब रात के स्याह अँधेरे में नेता जी के कारिंदे लकड़ी की सीढियों के सहारे आसानी से नही पहुच पाने वाली जगह तक अपनी पहुच बना लिया करते थे,इन सीढियों के सहारे कुछ तो पोस्टर बचे रह पाते थे पर मकान जिनका होता था वो भीतर ही भीतर उम्मीदवार को कोसते और पोस्टर हटाने की असफल कोशिश के दौरान चार पांच गालियों की पोटली ज़रूर बाँध आते थे उस जगह जहाँ न तो नेता जी पहुच पाते न ही पोस्टर चिपकाने वाले उनके कारिंदे.!
पोस्टर लगते तो लगता था चुनावी दंगल शुरू हो गया है,लाल,हरे और केसरिया रंग के इन पोस्टरों की खासियत होती थी,नेताओं को खुश  करने के लिए छुट भईया नेता हजार-दो हजार की संख्या में पोस्टर छपवा कर गली-मोहल्ले में चिपकवा देता था,रात में ही चावल की लेई बनती,उसको मिटटी या सिल्वर के बर्तन में रख कर सायकिल से आधी रात में कुछ लोग निकलते,ठण्ड के मौसम में मुह पर मफलर की चार परत लपेटे इन लोगों को देख कुत्ते शोर मचाते तो सांस ऊपर नीचे होती,गश्त पर निकले हुए हवालदार साहेब की भद्दी गलियां और हवालदार के जाने के बाद पोस्टर चिपकाने वालों की गालियाँ एक आपसी संवाद स्थापित करती जिसका असर पोस्टर चिपकाने के वक़्त हँसने में काम आता !
इस बार पोस्टर खोजने से मिल नही रहे हैं,ऐसी बात नही है की आर्थिक मंदी ने नेताओं की कमर तोड़ दी या फिर महंगाई ने पोस्टर के दाम में उछाल लगा दी है,असल बात है चुनाव आयोग की सख्ती जिसके कारण नेता किसी भी किस्म का जोखिम नही उठाना चाह रहे हैं,पोस्टर वो भी बिना इजाजत के लगाने से किसी भी वक़्त खटिया खड़ी हो सकती है ऐसा सोच कर कोई भी सांप के बिल में हाथ नही डालना चाहता ,ऐसे में दीवारों पर लगे पेंट चुनाव आयोग को दुआ दे रहे हैं पर साथ ही साथ पोस्टर चिपकाने और उनमे लिखे लोक-लुभावन चुनावी वादे-कसमों की की पंक्तियाँ अब इतिहास का अध्याय बनने की और निकल पड़े हैं,आइये इस बदलाव को स्वीकार्य करे पर इस स्वर्णिम पन्ने को तरोताज़ा रखने के साथ गाहे बगाहे चुनावी माहौल को गर्म करने के लिए दिए गये इसके योगदान को याद भी करते रहे.!
पोस्टर अमर रहे ...