Wednesday, 1 June 2011

भोपाल या फिर भोजपाल

मध्य प्रदेश की राजनीति में हर रोज़ के ड्रामे में एक ड्रामा पिछले कई महीनो से लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है,मामला है राजधानी के नाम परिवर्तन का,सत्ता धारी दल चाहता है की झीलों की नगरी का नाम राजा भोज के नाम से भोजपाल होना चाहिए,इसके लिए राजकीय कोष से लेज़र शो से लेकर तम्बू-कनात तक का पैसा निकाला गया,और सांस्कृतिक धरोहर के नाम पर बरसों और सदियों पुरानी गंगा-ज़मुनी तहजीब में यूनियन कार्बाइड जैसा ज़हर घोलने का पूरा प्रयास किया गया.!

एक राजा जो अपनी प्रजा के लिए रात में रूप बदल कर उसके हितों के लिए कार्य किया करता था,जिसने भोपाल में बड़ी झील का निर्माण करवाया उसने कभी सोचा भी नही होगा की आज उसी के नाम पर कथित राजनैतिक दल रोटियाँ सेंकेगे,आज भोपाल का एक आम भोपाली उसी झील के किनारे खड़ा होकर रजा भोज की लगी मूर्ति को निहारते हुए कहता होगा 'कों खां किया ऊ रिया है'.

भोपाल का नाम भोजपाल करने से न तो वारेन एनदरसन को सजा मिल जायगी,और ना ही सियासत करने वालों के लिए जनता कोई ख़ास तोहफा दे जायगी,इससे अगर मिलेगा तो सिर्फ ये की अब, भोपाली अपने नाम के आगे भोपाली से भोजपाली लगाना शुरू कर देंगे, सरकारी कागजों से भोपाल,भोजपाल हो जायगा,इन सब में आम जनता को तो तकलीफ होगी ही सरकारी पैसों की भी खूब बर्बादी होनी तय है,अगर ऐसा हो जाता है तो नवाबों का शहर कहीं खो जायगा और वो भोपाली मिजाज़ और बर्रुकट भोपालियों की तहजीब आने वाली नस्ल को नही लुभा पायगी,क्योंकि सरकार का छुपा हुआ मकसद यही है !

पिछले कई दिनों से चाय की चुस्कियों के साथ टोपी-दाढ़ी और भगवा रंग वालों की बाते सुनी और परखी है,कहीं किसी को अपनी सभ्यता और इतिहास खोने का डर सता रहा है तो कहीं किसी के भीतर अपने पूर्वज के सम्मान में उठा यह क़दम लुभा रहा है,इसके पीछे की मानसिकता सिर्फ आपस में कडवाहट को ही बढ़ावा देगी न की किसी प्रकार की जीत या हार का, जीत होगी तो सिर्फ उनकी जिन्हें ऐसे मुद्दे उछाल कर जनता को भटकना और उनके बीच दूरियां बढ़ाना आता हैं !

आज भी बड़े तालाब की कारीगरी देख मन मयूर हो जाता है,मीलों फैली झील में मुझे मेरा स्वर्णिम इतिहास दिखता है,मै कभी कभी इसकी तुलना गंगा से कर बैठता हूँ, और करूँ भी क्यों न, एक पाप धुलती है, तो दूसरी प्यास बुझाती है! सत्ताधारी  दल के मंत्री और मुखिया कहते हैं की हमे अपना इतिहास याद दिलाना है,संस्कृति को पुनः जीवित करना है,तो क्या यह न्यायोचित होगा की किसी की भावनाओं को ठेस पंहुचा कर और किसी के इतिहास के पन्ने को जलाकर संस्कृति को बचाया जाना चाहिए,अगर ऐसा करना है तो करिए,पर भूलियेगा नही जैसे आप मुगलों को आक्रान्ता कहते हैं शायद एक दिन आयेगा जब आपका सत्ता के नशे में चूर हो होकर उठाये इस क़दम की चर्चा होगी, और फिर ये सिलसिला यूँही चलता रहेगा,कभी आप तो कभी वो,क्या इसे रोका नही जा सकता,क्या कोई ऐसी इबारत नही लिखी जा सकती जिसमे मुहब्बत और इंसानियत की खुसबू आये,जहाँ हिन्दू और मुसलमान दोनों सारी कड़वाहट भुला दें,और जहाँ सियासत लोगों के लिए हो, न की खुद के हित साधने के लिए.


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