Friday, 10 February 2012

राहुल गांधी का सपना,यूपी हो अपना

कहा जाता है की उत्तर प्रदेश से हो कर संसद की सीड़ियाँ तय होती हैं,इस बात का ख्याल राहुल गांधी को तब नही था जब उन्होंने उत्तर प्रदेश के उन कामगार लोगों की खिल्ली फूलपुर के शुरूआती चुनावी रैली में उड़ाई थी जो यूपी से दुसरे राज्यों में कारोबार करने के लिए जाते हैं,पर मामला तूल पकड़ते ही पूरी कांग्रेस पार्टी बैकफुट पर आ गयी, लगे हाथ फूलपुर में सपा के कार्यकर्ता की केन्द्रीय मंत्रियों द्वारा की गयी पिटाई ने भी कांग्रेस को परेशानी में डाल दिया था,इन सब से उभरते हुए राहुल गांधी ने यूपी फतह की कमान खुद के कन्धों पर ले ली,गांधी परिवार की इस नई पीढ़ी के खेवनहार  ने यूपी के दूर-दराज़ इलाकों के तूफानी दौरे कर डाले,इनमे जुटने वाली भीड़ और राहुल जिंदाबाद के लगने वाले नारों ने कांग्रेस को यूपी विजय का सपना दिखा दिया !
एक ओर जहाँ उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के उद्घाटन मौके पर छात्र नेता की पिटाई हुई वहीँ दूसरी ओर फैजाबाद के मिल्कीपुर में राहुल गांधी नवजवानों के सहारे मृतप्राय कांग्रेस में जान फूंकने की बात करने लगे,राहुल में आया यह बदलाव एक परिपक्व राजनेता के प्रारम्भिक विजय का सूचक लगने लगा,राजनैतिक पंडितों की माने तो अब अमूल बेबी हाथी के चारे पर सवाल और सायकिल के समाजवाद पर निर्भीकता से वार करने लगा है,राहुल की सभा में जहाँ एक ओर हजारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने आ रहे हैं वही कुछ जगह से उनके विरोध की खबर भी मिल रही है,फिर भी यूपी की जनता को सीखने और समझने आये राहुल को  फैजाबाद में सुरक्षा घेरा तोड़ लोगों से हाथ मिलाने से कोई रोक नही पाया.!
पिछले बाईस सालों से वनवास झेल रही कांग्रेस के लिए यूपी चुनाव में जीत हासिल करना एक सपने जैसा लग रहा है,जहाँ उत्तर प्रदेश में बाकी अन्य पार्टियाँ जाती-वाद के मुद्दे को अन्दुरुनी तरीके से स्वीकार्य कर अपना गुणा गणित फिट करने में लगी हैं वहीँ कांग्रेस मजबूत प्रत्यासियों के सूखे से आज भी पीड़ित है,दिग्ग्विजय का जादू पूर्वांचल में अपनी पकड़ नही बना पाया,इसके लिए खुद दिग्गी राजा कितने कसूरवार है और कितनी कांग्रेस की राजनीति यह तो चुनाव बाद ही पता चल पायेगा फिलहाल उलेमा कौंसिल और पीस पार्टी ने कथित आतंकवाद एवं अल्पसंखयक युवाओं को बेवजह जेल में डालने के मुद्दे को लपकने में कामयाबी हासिल कर दिग्ग्विजय के सपने को ठेस पहुचने का काम किया है,वहीँ अन्य पिछड़ी जातियों के २७ % आरक्षण में से ४.५% आरक्षण अल्पसंख्यकों को देने के मामले में भी कांग्रेस को मुह की खानी पड़ी,भारतीय जनता पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी कांग्रेस के इस फैसले के मुखर विरोध में आ गये हैं वही दूसरी तरफ सलमान खुर्शीद के ९% के वायदे ने पिछड़ों के भीतर एक भय बनाने का काम किया है,इस मुद्दे पर भी अन्य पार्टियों ने कांग्रेस को घेरने का प्रयास किया किन्तु सफलता का प्रतिशत कितना हाथ आया ये  कहना मुश्किल होगा,पर इस संवेदनशील मुद्दे को भुनाने में बीजेपी ही दिलेरी दिखा रही है,बाबूलाल कुशवाहा प्रकरण से पिछड़े से  अगड़ा बनने के चक्कर में अपनी फजीहत पार्टी के भीतर करवाने के बाद आरक्षण एवं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आगे आ कर चिल्लाने से फिलहाल तो तौबा कर चुकी बीजेपी के लिए कांग्रेस को रोकना यूपी में मुश्किल हो रहा है !
अन्ना द्वारा दिया गया भ्रष्टाचार का मुद्दा यूपी में आते आते दम तोड़ चूका फिर भी कांग्रेस को नैतिक प्लेटफार्म पर घेरने के लिए वर्तमान में समाजवादी पार्टी से ज्यादा हिम्मत किसी अन्य में नही ,उसकी वजह बीजेपी द्वारा केन्द्र में कांग्रेस को घेरने के लिए की गयी बचकानी तैयारियां  और बी एस पी के ऊपर लगे एन.आर. एच. एम. घोटाले का आरोप ,अब बचा एक मात्र बड़ा विकल्प समाजवादी पार्टी के रूप में ,सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव अपनी हर एक रैली में कांग्रेस,राहुल पर खुल कर बरस रहे हैं,कांग्रेस के खिलाफ तो बोल सभी रहे हैं पर जनता के बीच में जिस आत्मविश्वास से केंद्र में कांग्रेस को बाहर से  समर्थन दे रही सपा के प्रदेश अध्यक्ष बुराईयाँ,बारीकियों के साथ गिना रहे हैं वैसे में जनता की हमदर्दी बटोरने में के साथ ही साथ सत्ता परिवर्तन कर चाभी सपा के हाथ में सौंपने की विनती  भी लगे हाथ कर लेते हैं !
प्रदेश में बाईस सालों की दुहाई दे कर कांग्रेस प्रदेश की जनता को विकास का झुनझुना थमाने की कोशिश में है,लोगों से बदलाव के नाम पर वोट कांग्रेस को देने की अपील रायबरेली में प्रियंका गांधी ने भी पर जब वही २४ घंटे में ७ घंटे बिजली आ रही है तो ऐसे में लाजिमी है की सवाल कांग्रेस पर उठेगा,क्योकि रायबरेली और अमेठी कांग्रेस का रजवाड़ा रहा है,जब पैतृक सीट पर ही विकास की रौशनी नही दिख रही हो तो बाकी प्रदेश का हाल कैसा होगा ये तो मतदाता जाने,लेकिन यूपी को आसान समझने वाले राहुल और कांग्रेसी ब्रिगेड के लिए ये लोहे  के चने चबाने जैसा ही होगा,यदि कांग्रेस का सपना सच होता है तो राहुल की राजनीति का भविष्य ज़रूर एक नये रंग और लिबास में होगा इस बात से इनकार चाहे प्रियंका करे या फिर खुद कांग्रेसी,क्योकि चुनावी नतीजे से पहले किसी भी नतीजे के बाद की तस्वीर न तो राहुल साफ़ करना चाहते हैं और न ही कांग्रेस पार्टी.!

Monday, 6 February 2012

इस बार पोस्टर नही छपे..

'यहाँ पोस्टर लगाना मना है' दीवारों की रंगत उड़ाने की हिमाकत अगर कोई करता था तो वो थे पोस्टर,चुनावी अखाड़े में जहाँ लाउडस्पीकर,टेम्पो,रिक्शे पर रख कर गाँव-मोहल्ले की सैर करते थे वहीँ बैठे बिठाए घर तक सन्देश चिपकाने का हुनर पोस्टरों से बेहतर शायद ही कोई और कर पाता था,खूबसूरती से पेंट हुई दीवारों और दरवाज़ों को रात में सही सलामत छोड़ कर चैन की नींद सोने वाले लोगों की सुबह तकलीफदेह होती थी जब उनकी निगाह नेता जी की मुस्कुराती और हाथ जोड़े हुए तस्वीर और उसके निचे लिखे वायदे पर पड़ती थी,इन वादों का असर क्या होता ये तो कहना मुश्किल है पर उससे पहले घर के तमाम सदस्य हाथों में बाल्टी ,मग और निरमा पाउडर लिए हुए पोस्टर साफ़ करने में जुट जाते थे,मुश्किल तो तब होती थी जब रात के स्याह अँधेरे में नेता जी के कारिंदे लकड़ी की सीढियों के सहारे आसानी से नही पहुच पाने वाली जगह तक अपनी पहुच बना लिया करते थे,इन सीढियों के सहारे कुछ तो पोस्टर बचे रह पाते थे पर मकान जिनका होता था वो भीतर ही भीतर उम्मीदवार को कोसते और पोस्टर हटाने की असफल कोशिश के दौरान चार पांच गालियों की पोटली ज़रूर बाँध आते थे उस जगह जहाँ न तो नेता जी पहुच पाते न ही पोस्टर चिपकाने वाले उनके कारिंदे.!
पोस्टर लगते तो लगता था चुनावी दंगल शुरू हो गया है,लाल,हरे और केसरिया रंग के इन पोस्टरों की खासियत होती थी,नेताओं को खुश  करने के लिए छुट भईया नेता हजार-दो हजार की संख्या में पोस्टर छपवा कर गली-मोहल्ले में चिपकवा देता था,रात में ही चावल की लेई बनती,उसको मिटटी या सिल्वर के बर्तन में रख कर सायकिल से आधी रात में कुछ लोग निकलते,ठण्ड के मौसम में मुह पर मफलर की चार परत लपेटे इन लोगों को देख कुत्ते शोर मचाते तो सांस ऊपर नीचे होती,गश्त पर निकले हुए हवालदार साहेब की भद्दी गलियां और हवालदार के जाने के बाद पोस्टर चिपकाने वालों की गालियाँ एक आपसी संवाद स्थापित करती जिसका असर पोस्टर चिपकाने के वक़्त हँसने में काम आता !
इस बार पोस्टर खोजने से मिल नही रहे हैं,ऐसी बात नही है की आर्थिक मंदी ने नेताओं की कमर तोड़ दी या फिर महंगाई ने पोस्टर के दाम में उछाल लगा दी है,असल बात है चुनाव आयोग की सख्ती जिसके कारण नेता किसी भी किस्म का जोखिम नही उठाना चाह रहे हैं,पोस्टर वो भी बिना इजाजत के लगाने से किसी भी वक़्त खटिया खड़ी हो सकती है ऐसा सोच कर कोई भी सांप के बिल में हाथ नही डालना चाहता ,ऐसे में दीवारों पर लगे पेंट चुनाव आयोग को दुआ दे रहे हैं पर साथ ही साथ पोस्टर चिपकाने और उनमे लिखे लोक-लुभावन चुनावी वादे-कसमों की की पंक्तियाँ अब इतिहास का अध्याय बनने की और निकल पड़े हैं,आइये इस बदलाव को स्वीकार्य करे पर इस स्वर्णिम पन्ने को तरोताज़ा रखने के साथ गाहे बगाहे चुनावी माहौल को गर्म करने के लिए दिए गये इसके योगदान को याद भी करते रहे.!
पोस्टर अमर रहे ...

Saturday, 25 June 2011

शायद वो ये नही है..

कल शाम जब शब्बो सब्जियां खरीदने घर से थोड़ी ही दूर पुलिया के पास गयी थी तो उसे फिर से वहां वो अजनबी लड़का खड़ा दिखाई दिया,शब्बो जल्दी जल्दी सब्जियां अपने झोले में डाल लेने चाहती थी,क्योंकि उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी,वो लड़का भी पता नही कैसा था,पिछले कई दिनों से उसका पीछा कर रहा था,वो जब कुआं पे पानी भरने जाती,अपनी बकरियां पास के जंगल में चराने जाती तो वो लड़का उसके आस पास आ जाता,शायद वो शब्बो से बात करना चाहता था,पर शब्बो को ये सब पसंद नही था की कोई अजनबी उसका पीछा करे.!
अभी वो सब्जियां तौला ही रही थी की, वो अजनबी उसके एकदम पास आ गया,और टमाटर ,आलू के दाम सब्जी वाले से पूछने लगा,पहली बार मेरे मन में उसके लिए कोई ख्याल आया था,मै सोचने लगी की,जनाब ने  चाहे कभी एक तरकारी भी न काटी हो और आया है दाम पूछने,वो दाम तो सब्जी वाले से पूछ रहा था पर देख मुझे रहा था,मन में जो बेचैनी थी वो एक ही पल में फुर्र हो गयी,अब अन्दर से जैसे एक अजीब सा एहसास कटी पतंग की तरह इधर उधर होने लगा,मैंने झोला उठाया और जल्दी से तेज क़दम से घर की तरफ चल पड़ी,उसने सब्जियां तो नही खरीदी पर मुझे जोर जोर से आवाज़ दे कर रोकने की कोशिश भले की,मैंने सोचा इस बार रुक ही जाती हूँ,जो होना होगा देखा जायगा.!
शब्बो ने जो फैसला किया था,वो बहुत मुश्किल सा था पर ऐसे फैसले शायद तभी होते हैं जब दोनों तरफ से दिल में कुछ कुछ होने लगता है,शब्बो की वो बेचैनी अब हलकी फुलकी ख़ुशी में बदल चुकी थी,पहली बार गाँव में किसी ने उसकी तरफ इतनी प्यार से देखा था,वरना सारे के सारे मर्द उसे खा जाने की नज़रों से देखते थे,माँ-बाप के गुज़र जाने के बाद खाला जान ने उसे पाल पोस कर बड़ा किया था,खाला की सख्त हिदायत थी की शाम होते होते घर के भीतर क़दम होने चाहिए..पर आज तो खालाजान की हिदायत और बातें भी शब्बो भूल चुकी थी,वो अजनबी पास आया और मुस्कुरा कर कहने लगा की मै इस गाँव के ठाकुर साहब का लड़का हूँ,शहर में रहकर पढाई करता हूँ,आपकी सादगी,खूबसूरती गाँव की और लड़कियों से आपको अलग करती है,क्या आप मेरी दोस्त बन सकती हो.?
उस अजनबी के के तार्रुफ़ और सवाल ने शब्बो के पैरों की थिरकन को बढ़ा दिया,एक ही पल में शब्बो के एहसास आसमान की बुलंदियों से ज़मीन पर आ गिरे थे,गाँव के ठाकुर जगजीत सिंह थे,उन पर गाँव में कई मुसलमानों के क़त्ल का इलज़ाम था,ऐसे में एहसासों के बदल छट गये और थोड़े ही वक़्त में शब्बो हिन्दू-मुसलमान के बीच में आ फसी,मज़हब की दीवार ने उसे खुले आँगन से बंद कमरे में ला बैठाया,शब्बो एक टक उसकी बातों को सुनती रही,उधर शाम भी होने को आ गयी थी,शब्बों ने उस अजनबी को अजनबी ही रहने दिया और सर पर दुपट्टे को रख आगे की तरफ बढ़ चली,पीछे ढेर सारे सवालों  के बिना जवाब दिए..

Tuesday, 21 June 2011

चलो भ्रष्टाचार मिटायें..!

कल रात में चिलम की एक लम्बी फूंक मारते हुए मुंशी चाचा ने कसम खा ली की अब चाहे जो हो जाए भाई भ्रष्टाचार मिटा कर ही अगली कश मारेंगे,जोर जोर से चिल्ला कर कह रहे थे की जब साधू-महाराज धुनी रमा कर बैठ सकते हैं तो मुझ जैसा कम पीने वाला आखिर कैसे पीछे रह सकता है,उनकी हाँ में हाँ,साथ बैठे आँखे बंद किये हुए दस्सू यादव भी जोर का दम भर रहे थे,दोनों को चिल्लाते और दांत पीसते देख कर रामजनी लोहार भी देशभक्ति की रौ में आकर सीना ठोक,देश से भ्रष्टाचार को मिटने के लिए बार बार कश ले कर नेताओं को गालीयों में लपेट रहा था.!

दस्सू ने कहा की पहले इसके लिए सिपाही से अनुमति ली जाए,पर ये काम बड़ा ही कठिन था,पुलिस वाला तो बिना लिए दिए कुछ सुनता ही नही,तीनो ने मिलकर सामने वाले रामलीला मैदान की बात तय की,अब आगे की बात पुलिस वाले से कौन करता,किसी की हिम्मत नही हो रही थी,अभी पिछले हफ्ते ही दस्सू और मुंशी जिला जेल से जमानत पर छूटे हैं,ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी इस मुहीम ने कहीं उन्हें फिर से जेल में न ठुसवा दे,इसका भय सताने लगा.!
पर मुंशी का दिमाग किसी आइन्स्टाइन से कम नही,उसने कहा की पहले हम भगवा और हरा रंग का चोला पहनगे,फिर पुलिस वालों से बात करेंगे,दस्सू और रामजनी ने केसरिया रंग और मुंशी ने हरा कुरता और सर पर टोपी डाल कर चौकी में तैनात लल्लन ठाकुर से बात करने की हिम्मत जुटाई.!
पर रामजनी की हिम्मत जवाब देनी लगी,कहने लगा की तुम दोनों तो जेल जा चुके हो,मुझे पुलिस वालों से कोई दुश्मनी नही मोल लेनी,इन बाबाओं के चक्कर में मै नही फसने वाला,
रामजनी तो कहने लगा की भाई,इन बाबा भगवान् के चक्कर में मत पड़ो,अपनी तो अफीम और चरस पीतें है और हमको भांग में ही लपेट्वा देते हैं,ई सब बड़े लोगन का बड़ा चोचला है,पर मुंशी चाचा तो अपनी बात के पक्के थे और साथ में दस्सू हो तो कहने ही क्या,चौकी के बहार मान मनौवल का ड्रामा चला,मोहल्ले के चार पांच आदमी उन्हें चौकी के बाहर तक ड्राप करके आ गए.!
पुलिस चौकी के अन्दर के माहौल से तीनो पहले से परिचित थे,इसलिए पहले ही साथ में दारु की छोटी बोतल और चखने के साथ प्रवेश किया,लल्लन चड्डी-बनियान में टेबल पर लात रखे आँख बंद किये आराम कर रहा था,मुंशी ने अभी परसों ही २०० रुपए बतौर तनख्वाह दिए थे लल्लन ठाकुर को,इसलिए उसी ने आवाज़ लगायी...'लल्लन भैय्या हम मुंशी पठान..भैय्या...उठिए'
लल्लन सिपाही को जैसे किसी ने चिकोटी काट ली हो,उठते ही चार पांच टाईप की गाली देते हुए खुद को संभाला,कहा 'क्या हुआ बे,काहे आये हो..'
 तीनो धडाम से ज़मीन पे बैठ गये,पर लल्लन ने उनके बदले हुए हुलिए से उन्हें इज्ज़त दी और कहा 'ई का हो गया है,सत्संग-कीर्तन करोगे का..'
रामजनी ने तापाक से उसे बीच में ही रोकते हुए कहा 'नही साहेब,अनशन,करबे हम सब,ई ससुरा भ्रष्टाचार और काले धन के लिए...'
लल्लन की आँखे खुली की खुली रह गयी,कहा ई देशभक्ति का फार्मूला कहाँ से लाये हो,हम तुम्हारी मदद कैसे कर सकते हैं..?
बस साहब,परमिसन दे देव,तो हम कल ही से बैठ जाते हैं.रामलीला मैदान में,दस्सू ने कहा..
लल्लन के भीतर भी देश प्रेम जाग उठा,वो भी करोडो के काले धन को वापिस भारत लेने को बेताब हो गया,दे दी परमिसन..
अब तीनो बहार निकल चुके हैं,पर भूख हड़ताल पर कौन बैठेगा,खोजबीन शुरू हुई,उनको याद आया की पिछले दफे प्रधान जी के खिलाफ रामाधारी केवट जो की गांधीवादी भी है,२० दिन भूख हड़ताल पर बैठा था,उसे तीनो पकड़ लाये,पर वो किसी सूरत में बैठने को तैयार नही था,पिछली बार वो बेचारा बैठ तो गया पर उसे उठाने या मानाने कोई नही आया,आखिर में पुलिस वालों ने उसके नाक में गुलुकोज डाल उसका भूख हड़ताल तोडवाया था.! 
दस्सू ने हिम्मत दिखा कर अनशन की शुरुआत की,धीरे धीरे भीड़ जुड़ने लगी,लोगों के भीतर देश हित के लिए ज़ज्बात उमड़ने लगे,अब आगे क्या होगा,ये आने वाला वक़्त बताएगा,पर इस भ्रष्टाचार ने तीन पियक्कड़ों को कुछ अच्छा करने की राह दिखयी,इसलिए इनके लिए भ्रष्टाचार ही अच्छा है,मेरी नज़र में..

Monday, 20 June 2011

बलात्कारियों की बादशाहत

उत्तर प्रदेश में इन दिनों जो कुछ हो रहा है,उसके ज़िम्मेदार चाहे जो भी हों पर एक बात खुल कर सामने आ गयी है की सत्ता का मजा ले रही बहुजन समाज पार्टी जिसकी मुखिया मायावती जी हैं सीधे रूप से न सही, पर कहीं न कहीं इनकी जवाबदेही  बनती है,लेकिन मुखिया के खेवैया ब्रिजलाल न जाने क्यूँ पूरी सल्तनत को बचाने के लिए आतुर दिखाई दे रहे हैं,अब कोई इन्हें जा कर बताये की लखीमपुर के निघासन थाने के भीतर इनकी वर्दी ने क्या गुल खिलाये और कोई इन्हें ये भी बताये की मिल्कीपुर से बिधायक आनंदसेन यादव ने कानून की पढाई कर रही २४ साल की दलित युवती के साथ क्या कुछ किया था !

बसपा के पिछले चार सालों के शासन काल में उत्तर प्रदेश महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वाला तीसरा बड़ा प्रदेश बन कर उभरा है,जहाँ पश्चिम बंगाल में २३३०७ संख्या रही वहीँ उत्तर प्रदेश इससे सिर्फ कुछ कम २३२५४ के साथ अपनी ज़ोरदार उपस्थिति दर्ज करता नज़र आया है!
  खाकी और खादी ने महिलाओं को ही नही बल्कि मासूम बच्चियों तक को अपने हवस का शिकार जिस तेजी के साथ बनाया है उसे पढ़ कर आम आदमी का सर नीचा हो जाए,जिनके हाथों में महिलाओं की सुरक्षा का दायित्व होता है वही इनकी बोटियाँ नोचने को आतुर नज़र आते हैं,लखीमपुर की घटना ने तो पुरे प्रदेश के साथ ही देश तक को सोचने पर मजबूर कर दिया की हमारी पुलिस और कितना निचे गिर सकती है,१४ साल की मुस्लिम बच्ची के साथ पुरे थाने ने बलात्कार करने की कोशिश की या कोशिश में सफल रहे यह तो शासन जाने पर इस हैवानियत के गवाह ने जिस तरह से अपना बयान दिया है वह पुरे समाज पर एक ज़ोरदार तमाचा है !

खाकी की हनक और सनक ने १६ मई को प्रतापगढ़ की छोटी सादरी नामक जगह पर भी एक बच्ची के साथ बलात्कार किया,यहाँ २ पुलिस वालों ने एक लड़की को पुलिस थाने में ले जाकर बयान दर्ज करवाने के नाम पर वो कुछ किया जिसे हमारे समाज में सबसे दोयम दर्जे का अपराध मन जाता है,पर सिर्फ मने जाने से ही कुछ नही होता,यह उस खाकी पर सवाल खड़ा करता है जो जनता की सुरक्षा की कसमे खाते हैं.!
ये बात हुई खाकी की अब खादी ने क्या कुछ किया है वो भी जान लीजिये-

१-योगेन्द्र सागर-बिल्सी से बसपा के विधायक,आरोप है की २४ दिनों तक एक लड़की के साथ गैंग रेप किया और करवाया !

२-पुरुषोत्तम द्विवेदी-बांदा से बसपा के विधायक,एक लड़की को बंधक बना कर रखा और कई दिनों तक बलात्कार किया.!

३-आनंद सेन यादव-मिल्कीपुर से बसपा के विधायक और पूर्वमंत्री,आरोप है की २४ साल की दलित युवती के साथ बलात्कार !

४-भगवान् शर्मा-डिबाई से बसपा के विधायक,२८ साल की महिला के साथ बलात्कार का आरोप.!

तो ये है हकीक़त उस प्रदेश की जहाँ की मुख्यमंत्री अब तक की सबसे ताक़तवर महिला मुख्यमंत्री के रूप में दिखती है,जहाँ खादी और खाकी ने मिलकर महिलओं पर जुल्म की नई इबारत लिख डाली है,सत्ता के नशे में चूर और ऊपर से ले कर निचे तक बिकते थानों की पोल खोलती ये सच्चाई है,बाते कुछ भी हों पर तस्वीर तो हमारे सामने है,एक शेर याद आ रहा है...
   'ज़ुल्म,सितम की इंतहा हुई,
        सियासत के साथ वर्दी भी बेवफा हुई'
                                                                         -मोहम्मद अनस 

Wednesday, 1 June 2011

भोपाल या फिर भोजपाल

मध्य प्रदेश की राजनीति में हर रोज़ के ड्रामे में एक ड्रामा पिछले कई महीनो से लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है,मामला है राजधानी के नाम परिवर्तन का,सत्ता धारी दल चाहता है की झीलों की नगरी का नाम राजा भोज के नाम से भोजपाल होना चाहिए,इसके लिए राजकीय कोष से लेज़र शो से लेकर तम्बू-कनात तक का पैसा निकाला गया,और सांस्कृतिक धरोहर के नाम पर बरसों और सदियों पुरानी गंगा-ज़मुनी तहजीब में यूनियन कार्बाइड जैसा ज़हर घोलने का पूरा प्रयास किया गया.!

एक राजा जो अपनी प्रजा के लिए रात में रूप बदल कर उसके हितों के लिए कार्य किया करता था,जिसने भोपाल में बड़ी झील का निर्माण करवाया उसने कभी सोचा भी नही होगा की आज उसी के नाम पर कथित राजनैतिक दल रोटियाँ सेंकेगे,आज भोपाल का एक आम भोपाली उसी झील के किनारे खड़ा होकर रजा भोज की लगी मूर्ति को निहारते हुए कहता होगा 'कों खां किया ऊ रिया है'.

भोपाल का नाम भोजपाल करने से न तो वारेन एनदरसन को सजा मिल जायगी,और ना ही सियासत करने वालों के लिए जनता कोई ख़ास तोहफा दे जायगी,इससे अगर मिलेगा तो सिर्फ ये की अब, भोपाली अपने नाम के आगे भोपाली से भोजपाली लगाना शुरू कर देंगे, सरकारी कागजों से भोपाल,भोजपाल हो जायगा,इन सब में आम जनता को तो तकलीफ होगी ही सरकारी पैसों की भी खूब बर्बादी होनी तय है,अगर ऐसा हो जाता है तो नवाबों का शहर कहीं खो जायगा और वो भोपाली मिजाज़ और बर्रुकट भोपालियों की तहजीब आने वाली नस्ल को नही लुभा पायगी,क्योंकि सरकार का छुपा हुआ मकसद यही है !

पिछले कई दिनों से चाय की चुस्कियों के साथ टोपी-दाढ़ी और भगवा रंग वालों की बाते सुनी और परखी है,कहीं किसी को अपनी सभ्यता और इतिहास खोने का डर सता रहा है तो कहीं किसी के भीतर अपने पूर्वज के सम्मान में उठा यह क़दम लुभा रहा है,इसके पीछे की मानसिकता सिर्फ आपस में कडवाहट को ही बढ़ावा देगी न की किसी प्रकार की जीत या हार का, जीत होगी तो सिर्फ उनकी जिन्हें ऐसे मुद्दे उछाल कर जनता को भटकना और उनके बीच दूरियां बढ़ाना आता हैं !

आज भी बड़े तालाब की कारीगरी देख मन मयूर हो जाता है,मीलों फैली झील में मुझे मेरा स्वर्णिम इतिहास दिखता है,मै कभी कभी इसकी तुलना गंगा से कर बैठता हूँ, और करूँ भी क्यों न, एक पाप धुलती है, तो दूसरी प्यास बुझाती है! सत्ताधारी  दल के मंत्री और मुखिया कहते हैं की हमे अपना इतिहास याद दिलाना है,संस्कृति को पुनः जीवित करना है,तो क्या यह न्यायोचित होगा की किसी की भावनाओं को ठेस पंहुचा कर और किसी के इतिहास के पन्ने को जलाकर संस्कृति को बचाया जाना चाहिए,अगर ऐसा करना है तो करिए,पर भूलियेगा नही जैसे आप मुगलों को आक्रान्ता कहते हैं शायद एक दिन आयेगा जब आपका सत्ता के नशे में चूर हो होकर उठाये इस क़दम की चर्चा होगी, और फिर ये सिलसिला यूँही चलता रहेगा,कभी आप तो कभी वो,क्या इसे रोका नही जा सकता,क्या कोई ऐसी इबारत नही लिखी जा सकती जिसमे मुहब्बत और इंसानियत की खुसबू आये,जहाँ हिन्दू और मुसलमान दोनों सारी कड़वाहट भुला दें,और जहाँ सियासत लोगों के लिए हो, न की खुद के हित साधने के लिए.


Monday, 30 May 2011

अनस-एक छोटा सा सफ़रनामा

आज से यही कोई इक्कीस बाईस साल पहले की बात थी,इलाहबाद के झूंसी  में खान अनवर अली के घर में मेरी पैदाइश हुई,खान अनवर अली मेरे परदादा थे,उन्हें मैंने देखा नही है बस तस्वीर है जिसमे सफ़ेद दाढ़ी और कुरते-पैजामे के साथ हाथ में एक छड़ी लेकर वो खड़े मुस्कुरा रहे हैं,आज भी वो हमारे मेहमान खाने में दिवार पर टंगी हुई है,दादा अकबर अली ने बचपन में घुड़सवारी सिखाई,घर में काम करने वाले दस्सू चाचा ने सायकिल चलाना सिखाया और संकीर्तन आश्रम में हिंदी,मदरसे में उर्दू अरबी का ककहरा सीखा,मौलवी साहेब तो बहुत पीटा करते थे,रात में मास्टर दिनेश आते और लालटेन की धीमी लाइट में अंग्रेजी पढ़ा देते थे,इस वक़्त नींद बहुत आती थी,पर साथ में और ढेर सारे भाई-बहनों के रटने की आवाज़ से मै भी बैठे-बैठे हिला करता था,बारिश में छत पर चढ़ कर भीगना और फिर आंधी-पानी के माहौल में खूब खेला करता था,साथ के और बच्चे आ जाते थे,मेरे अब्बूजान को मेरे खेलना पता नही क्यों अखरता था,हमेशा अन्दर जाने को बोलते,कहते पढना नही है क्या,?और मै ना का इशारा करता पर हाजी सिराज अहमद (मेरे अब्बू) को  तो हां सुनने की आदत थी,मदरसों और आश्रमों से निकल कर मै कान्वेंट की तरफ गया,हाफ निकर,टाई और शर्ट,मेरे लिए ये सब नया था,पर काफी अच्छा था,अब्बू अपनी स्कूटर से तो दादा कभी पुरानी कार से स्कूल के गेट तक छोड़ आते.!
मुझे पता नही क्यों औरों से ज्यादा लाड प्यार मिलता,शायद मै अच्छे और रसूख वाले खानदान से था इसलिए या फिर कुछ और..अखबार पड़ने का शौक यहीं से लगा,घर में उर्दू,हिंदी के अखबार आते थे,मै जोर-जोर से हकीम इल्यास साहब को सुनाता था,क्योंकि उन्हें दिखाई और सुनाई कम पड़ता था,मेरी आवाज़ सुन कर वो कहा करते थे की भाई वाह,बड़ी बुलंद आवाज़ पायी है बच्चे ने,घर में सियासी माहौल था ,चुनाव लड़ा नही बल्कि लड़वाया जाता था,पर अब लड़ा जाने लगा है,मुझे सियासत पसंद है और सबको होनी भी चाहिए क्योंकि जब राजनीति हम सब की ज़िन्दगी की दिशा और दशा अप्रत्यक्ष रूप से तय करती है तो हमे इससे नफरत नही बल्कि इसकी दशा और दिशा बदलने में आगे आना चाहिए,इन सब के बीच मै बड़ा होता गया, और चीज़े मुझसे भी बड़ी,आठवी,नौवी,और ऐसे करते करते मै ग्रेज़ुएशन तक पहुच गया,यहाँ आ कर मामला थोडा संगीन हो गया,मै एक ज़िम्मेदार इंसान बन चुका था.!
जिस तरह की शिक्षा परिवार से मिली थी की औरों की मदद करो,क्योकि तुम इस लायक हो,करने लगा,ज़िन्दगी में एक लक्ष्य बना लिया की किसी के साथ अन्याय नही होने दूंगा,इसलिए पत्रकारिता को चुना,तीन साल तक इसकी बारीकियों को समझा,आम इंसान और हुकूमत करने वालों के बीच का फर्क जाना,मानवता की उड़ती धज्जियों से यहीं वाकिफ हुआ,बिना किस लोभ लालच के सब को मित्र बनता गया,उन मित्रों में कुछ धूर्त निकले तो कुछ थोड़े अच्छे,मै धूर्त मित्रों से ये कहना चाहता हूँ की उनकी धूर्तता से मेरा कुछ बिगड़ा नही बल्कि उन्होंने मुझे ही खो दिया,क्योकि मै ऐसे लोगो से शख्त नफरत करता हूँ.!
 अभी हालात और बिगड़ने वाले थे क्योकि मै कूटनीति की भाषा न जान कर मन की भाषा जानता था,लोगो ने बहुत सारे तरीकों से रोकने की कोशिश की,पर मै अपनी सुनता था,सब मुझे नेता कहने लगे,आज कल समाज में नेता बुरे व्यक्ति को कहा जाता है,पर ये उन सब की हताशा थी,निराशा थी जिसे वो इस तरह से निकाल रहे थे की सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे,पर यहाँ सांप तो बहुत ही मजबूत और अपने ऊपर हद से ज्यादा यकीन करने वाला व्यक्ति था,किसी की एक न चली वो आज भी उन सब पर भारी  है जिन पर कल था.!
ग्रेज़ुएशन का सफ़र ख़त्म हुआ,इलाहाबाद की ज़िन्दगी खूब जी ली,अब बाहर निकलना था,घर वाले कह रहे थे कहाँ जा रहे हो,यहीं रहो अपना बिजनेस करो,पर मेरा मन तो आगे और पढने का था,पत्रकारिता की उच्च शिक्षा के लिए भारतीय जनसंचार संस्थान की परीक्षा उत्तीर्ण की पर दुर्भाग्य से आरक्षण का शिकार हुआ,कुछ ऐसे ही इंटरवीव् से निकाल बहार हुआ,पर किस्मत में शायद कुछ अच्छा होना तय था इसलिए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में दाखिला हो गया,यहाँ आने के बाद जो धार पहले थी उसमे थोड़ी तेजी आई,नयी जगह में पहले रहा नही ,शुरुआत में थोडा मुश्किलें आई पर जल्दी ही भोपाल मेरा अपना हो गया,फिर से ज़िन्दगी की रफ़्तार को तमाम रंगों से रंग कर आगे बढ़ा लिया,और अब निरंतर आगे की जा रहा हूँ,मेरे सपने मुझसे ज्यादा दूर पर नही है,उन्हें में खुली आँखों से अब देखने लगा हूँ,और उनकी हकीकत से रूबरू भी हो रहा हूँ.!