आज से यही कोई इक्कीस बाईस साल पहले की बात थी,इलाहबाद के झूंसी में खान अनवर अली के घर में मेरी पैदाइश हुई,खान अनवर अली मेरे परदादा थे,उन्हें मैंने देखा नही है बस तस्वीर है जिसमे सफ़ेद दाढ़ी और कुरते-पैजामे के साथ हाथ में एक छड़ी लेकर वो खड़े मुस्कुरा रहे हैं,आज भी वो हमारे मेहमान खाने में दिवार पर टंगी हुई है,दादा अकबर अली ने बचपन में घुड़सवारी सिखाई,घर में काम करने वाले दस्सू चाचा ने सायकिल चलाना सिखाया और संकीर्तन आश्रम में हिंदी,मदरसे में उर्दू अरबी का ककहरा सीखा,मौलवी साहेब तो बहुत पीटा करते थे,रात में मास्टर दिनेश आते और लालटेन की धीमी लाइट में अंग्रेजी पढ़ा देते थे,इस वक़्त नींद बहुत आती थी,पर साथ में और ढेर सारे भाई-बहनों के रटने की आवाज़ से मै भी बैठे-बैठे हिला करता था,बारिश में छत पर चढ़ कर भीगना और फिर आंधी-पानी के माहौल में खूब खेला करता था,साथ के और बच्चे आ जाते थे,मेरे अब्बूजान को मेरे खेलना पता नही क्यों अखरता था,हमेशा अन्दर जाने को बोलते,कहते पढना नही है क्या,?और मै ना का इशारा करता पर हाजी सिराज अहमद (मेरे अब्बू) को तो हां सुनने की आदत थी,मदरसों और आश्रमों से निकल कर मै कान्वेंट की तरफ गया,हाफ निकर,टाई और शर्ट,मेरे लिए ये सब नया था,पर काफी अच्छा था,अब्बू अपनी स्कूटर से तो दादा कभी पुरानी कार से स्कूल के गेट तक छोड़ आते.!
मुझे पता नही क्यों औरों से ज्यादा लाड प्यार मिलता,शायद मै अच्छे और रसूख वाले खानदान से था इसलिए या फिर कुछ और..अखबार पड़ने का शौक यहीं से लगा,घर में उर्दू,हिंदी के अखबार आते थे,मै जोर-जोर से हकीम इल्यास साहब को सुनाता था,क्योंकि उन्हें दिखाई और सुनाई कम पड़ता था,मेरी आवाज़ सुन कर वो कहा करते थे की भाई वाह,बड़ी बुलंद आवाज़ पायी है बच्चे ने,घर में सियासी माहौल था ,चुनाव लड़ा नही बल्कि लड़वाया जाता था,पर अब लड़ा जाने लगा है,मुझे सियासत पसंद है और सबको होनी भी चाहिए क्योंकि जब राजनीति हम सब की ज़िन्दगी की दिशा और दशा अप्रत्यक्ष रूप से तय करती है तो हमे इससे नफरत नही बल्कि इसकी दशा और दिशा बदलने में आगे आना चाहिए,इन सब के बीच मै बड़ा होता गया, और चीज़े मुझसे भी बड़ी,आठवी,नौवी,और ऐसे करते करते मै ग्रेज़ुएशन तक पहुच गया,यहाँ आ कर मामला थोडा संगीन हो गया,मै एक ज़िम्मेदार इंसान बन चुका था.!
जिस तरह की शिक्षा परिवार से मिली थी की औरों की मदद करो,क्योकि तुम इस लायक हो,करने लगा,ज़िन्दगी में एक लक्ष्य बना लिया की किसी के साथ अन्याय नही होने दूंगा,इसलिए पत्रकारिता को चुना,तीन साल तक इसकी बारीकियों को समझा,आम इंसान और हुकूमत करने वालों के बीच का फर्क जाना,मानवता की उड़ती धज्जियों से यहीं वाकिफ हुआ,बिना किस लोभ लालच के सब को मित्र बनता गया,उन मित्रों में कुछ धूर्त निकले तो कुछ थोड़े अच्छे,मै धूर्त मित्रों से ये कहना चाहता हूँ की उनकी धूर्तता से मेरा कुछ बिगड़ा नही बल्कि उन्होंने मुझे ही खो दिया,क्योकि मै ऐसे लोगो से शख्त नफरत करता हूँ.!
अभी हालात और बिगड़ने वाले थे क्योकि मै कूटनीति की भाषा न जान कर मन की भाषा जानता था,लोगो ने बहुत सारे तरीकों से रोकने की कोशिश की,पर मै अपनी सुनता था,सब मुझे नेता कहने लगे,आज कल समाज में नेता बुरे व्यक्ति को कहा जाता है,पर ये उन सब की हताशा थी,निराशा थी जिसे वो इस तरह से निकाल रहे थे की सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे,पर यहाँ सांप तो बहुत ही मजबूत और अपने ऊपर हद से ज्यादा यकीन करने वाला व्यक्ति था,किसी की एक न चली वो आज भी उन सब पर भारी है जिन पर कल था.!
ग्रेज़ुएशन का सफ़र ख़त्म हुआ,इलाहाबाद की ज़िन्दगी खूब जी ली,अब बाहर निकलना था,घर वाले कह रहे थे कहाँ जा रहे हो,यहीं रहो अपना बिजनेस करो,पर मेरा मन तो आगे और पढने का था,पत्रकारिता की उच्च शिक्षा के लिए भारतीय जनसंचार संस्थान की परीक्षा उत्तीर्ण की पर दुर्भाग्य से आरक्षण का शिकार हुआ,कुछ ऐसे ही इंटरवीव् से निकाल बहार हुआ,पर किस्मत में शायद कुछ अच्छा होना तय था इसलिए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में दाखिला हो गया,यहाँ आने के बाद जो धार पहले थी उसमे थोड़ी तेजी आई,नयी जगह में पहले रहा नही ,शुरुआत में थोडा मुश्किलें आई पर जल्दी ही भोपाल मेरा अपना हो गया,फिर से ज़िन्दगी की रफ़्तार को तमाम रंगों से रंग कर आगे बढ़ा लिया,और अब निरंतर आगे की जा रहा हूँ,मेरे सपने मुझसे ज्यादा दूर पर नही है,उन्हें में खुली आँखों से अब देखने लगा हूँ,और उनकी हकीकत से रूबरू भी हो रहा हूँ.!
मुझे पता नही क्यों औरों से ज्यादा लाड प्यार मिलता,शायद मै अच्छे और रसूख वाले खानदान से था इसलिए या फिर कुछ और..अखबार पड़ने का शौक यहीं से लगा,घर में उर्दू,हिंदी के अखबार आते थे,मै जोर-जोर से हकीम इल्यास साहब को सुनाता था,क्योंकि उन्हें दिखाई और सुनाई कम पड़ता था,मेरी आवाज़ सुन कर वो कहा करते थे की भाई वाह,बड़ी बुलंद आवाज़ पायी है बच्चे ने,घर में सियासी माहौल था ,चुनाव लड़ा नही बल्कि लड़वाया जाता था,पर अब लड़ा जाने लगा है,मुझे सियासत पसंद है और सबको होनी भी चाहिए क्योंकि जब राजनीति हम सब की ज़िन्दगी की दिशा और दशा अप्रत्यक्ष रूप से तय करती है तो हमे इससे नफरत नही बल्कि इसकी दशा और दिशा बदलने में आगे आना चाहिए,इन सब के बीच मै बड़ा होता गया, और चीज़े मुझसे भी बड़ी,आठवी,नौवी,और ऐसे करते करते मै ग्रेज़ुएशन तक पहुच गया,यहाँ आ कर मामला थोडा संगीन हो गया,मै एक ज़िम्मेदार इंसान बन चुका था.!
जिस तरह की शिक्षा परिवार से मिली थी की औरों की मदद करो,क्योकि तुम इस लायक हो,करने लगा,ज़िन्दगी में एक लक्ष्य बना लिया की किसी के साथ अन्याय नही होने दूंगा,इसलिए पत्रकारिता को चुना,तीन साल तक इसकी बारीकियों को समझा,आम इंसान और हुकूमत करने वालों के बीच का फर्क जाना,मानवता की उड़ती धज्जियों से यहीं वाकिफ हुआ,बिना किस लोभ लालच के सब को मित्र बनता गया,उन मित्रों में कुछ धूर्त निकले तो कुछ थोड़े अच्छे,मै धूर्त मित्रों से ये कहना चाहता हूँ की उनकी धूर्तता से मेरा कुछ बिगड़ा नही बल्कि उन्होंने मुझे ही खो दिया,क्योकि मै ऐसे लोगो से शख्त नफरत करता हूँ.!
अभी हालात और बिगड़ने वाले थे क्योकि मै कूटनीति की भाषा न जान कर मन की भाषा जानता था,लोगो ने बहुत सारे तरीकों से रोकने की कोशिश की,पर मै अपनी सुनता था,सब मुझे नेता कहने लगे,आज कल समाज में नेता बुरे व्यक्ति को कहा जाता है,पर ये उन सब की हताशा थी,निराशा थी जिसे वो इस तरह से निकाल रहे थे की सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे,पर यहाँ सांप तो बहुत ही मजबूत और अपने ऊपर हद से ज्यादा यकीन करने वाला व्यक्ति था,किसी की एक न चली वो आज भी उन सब पर भारी है जिन पर कल था.!
ग्रेज़ुएशन का सफ़र ख़त्म हुआ,इलाहाबाद की ज़िन्दगी खूब जी ली,अब बाहर निकलना था,घर वाले कह रहे थे कहाँ जा रहे हो,यहीं रहो अपना बिजनेस करो,पर मेरा मन तो आगे और पढने का था,पत्रकारिता की उच्च शिक्षा के लिए भारतीय जनसंचार संस्थान की परीक्षा उत्तीर्ण की पर दुर्भाग्य से आरक्षण का शिकार हुआ,कुछ ऐसे ही इंटरवीव् से निकाल बहार हुआ,पर किस्मत में शायद कुछ अच्छा होना तय था इसलिए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में दाखिला हो गया,यहाँ आने के बाद जो धार पहले थी उसमे थोड़ी तेजी आई,नयी जगह में पहले रहा नही ,शुरुआत में थोडा मुश्किलें आई पर जल्दी ही भोपाल मेरा अपना हो गया,फिर से ज़िन्दगी की रफ़्तार को तमाम रंगों से रंग कर आगे बढ़ा लिया,और अब निरंतर आगे की जा रहा हूँ,मेरे सपने मुझसे ज्यादा दूर पर नही है,उन्हें में खुली आँखों से अब देखने लगा हूँ,और उनकी हकीकत से रूबरू भी हो रहा हूँ.!