Saturday, 25 June 2011

शायद वो ये नही है..

कल शाम जब शब्बो सब्जियां खरीदने घर से थोड़ी ही दूर पुलिया के पास गयी थी तो उसे फिर से वहां वो अजनबी लड़का खड़ा दिखाई दिया,शब्बो जल्दी जल्दी सब्जियां अपने झोले में डाल लेने चाहती थी,क्योंकि उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी,वो लड़का भी पता नही कैसा था,पिछले कई दिनों से उसका पीछा कर रहा था,वो जब कुआं पे पानी भरने जाती,अपनी बकरियां पास के जंगल में चराने जाती तो वो लड़का उसके आस पास आ जाता,शायद वो शब्बो से बात करना चाहता था,पर शब्बो को ये सब पसंद नही था की कोई अजनबी उसका पीछा करे.!
अभी वो सब्जियां तौला ही रही थी की, वो अजनबी उसके एकदम पास आ गया,और टमाटर ,आलू के दाम सब्जी वाले से पूछने लगा,पहली बार मेरे मन में उसके लिए कोई ख्याल आया था,मै सोचने लगी की,जनाब ने  चाहे कभी एक तरकारी भी न काटी हो और आया है दाम पूछने,वो दाम तो सब्जी वाले से पूछ रहा था पर देख मुझे रहा था,मन में जो बेचैनी थी वो एक ही पल में फुर्र हो गयी,अब अन्दर से जैसे एक अजीब सा एहसास कटी पतंग की तरह इधर उधर होने लगा,मैंने झोला उठाया और जल्दी से तेज क़दम से घर की तरफ चल पड़ी,उसने सब्जियां तो नही खरीदी पर मुझे जोर जोर से आवाज़ दे कर रोकने की कोशिश भले की,मैंने सोचा इस बार रुक ही जाती हूँ,जो होना होगा देखा जायगा.!
शब्बो ने जो फैसला किया था,वो बहुत मुश्किल सा था पर ऐसे फैसले शायद तभी होते हैं जब दोनों तरफ से दिल में कुछ कुछ होने लगता है,शब्बो की वो बेचैनी अब हलकी फुलकी ख़ुशी में बदल चुकी थी,पहली बार गाँव में किसी ने उसकी तरफ इतनी प्यार से देखा था,वरना सारे के सारे मर्द उसे खा जाने की नज़रों से देखते थे,माँ-बाप के गुज़र जाने के बाद खाला जान ने उसे पाल पोस कर बड़ा किया था,खाला की सख्त हिदायत थी की शाम होते होते घर के भीतर क़दम होने चाहिए..पर आज तो खालाजान की हिदायत और बातें भी शब्बो भूल चुकी थी,वो अजनबी पास आया और मुस्कुरा कर कहने लगा की मै इस गाँव के ठाकुर साहब का लड़का हूँ,शहर में रहकर पढाई करता हूँ,आपकी सादगी,खूबसूरती गाँव की और लड़कियों से आपको अलग करती है,क्या आप मेरी दोस्त बन सकती हो.?
उस अजनबी के के तार्रुफ़ और सवाल ने शब्बो के पैरों की थिरकन को बढ़ा दिया,एक ही पल में शब्बो के एहसास आसमान की बुलंदियों से ज़मीन पर आ गिरे थे,गाँव के ठाकुर जगजीत सिंह थे,उन पर गाँव में कई मुसलमानों के क़त्ल का इलज़ाम था,ऐसे में एहसासों के बदल छट गये और थोड़े ही वक़्त में शब्बो हिन्दू-मुसलमान के बीच में आ फसी,मज़हब की दीवार ने उसे खुले आँगन से बंद कमरे में ला बैठाया,शब्बो एक टक उसकी बातों को सुनती रही,उधर शाम भी होने को आ गयी थी,शब्बों ने उस अजनबी को अजनबी ही रहने दिया और सर पर दुपट्टे को रख आगे की तरफ बढ़ चली,पीछे ढेर सारे सवालों  के बिना जवाब दिए..

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